स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मंदिर का संबंध गजपति दिव्यसिंह देव से; पूर्व महंतों की जर्जर समाधियों ने संरक्षण को लेकर बढ़ाई चिंता
दिलीप कुमार पटनायक

खोरधा, २५ अक्टूबर: ओडिशा के खोरधा जिले के जगुलीपटना स्थित श्री अनंत पुरुषोत्तम मंदिर का ऐतिहासिक महत्व और विशिष्ट धार्मिक परंपराएं रविवार को आयोजित तीसरे खोरधा हेरिटेज वॉक के दौरान चर्चा के केंद्र में रहीं। इस अवसर पर प्रतिभागियों ने मंदिर की उत्पत्ति, प्राचीन पूजा-पद्धतियों तथा इससे जुड़ी ऐतिहासिक लोककथाओं के बारे में जानकारी प्राप्त की। साथ ही, मंदिर परिसर में पूर्व महंतों की जर्जर होती समाधियों की स्थिति ने ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की आवश्यकता को लेकर गंभीर चिंता पैदा की।

इस कार्यक्रम का आयोजन खोरधा जिले की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने, ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण को प्रोत्साहित करने तथा नई पीढ़ी को क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत से परिचित कराने के उद्देश्य से किया गया था।

हेरिटेज वॉक की शुरुआत सुबह नौ बजे चंडी चुआ चौक से हुई। खोरधा चैप्टर के सदस्यों द्वारा स्वागत किए जाने के बाद प्रतिभागियों ने मां चंडी के मंदिर में पूजा-अर्चना की। इसके पश्चात वे खोरधा-नयागढ़ मार्ग से होते हुए जगुलीपटना स्थित श्री अनंत पुरुषोत्तम मंदिर पहुंचे।
मंदिर पहुंचने पर सेवायत कमल लोचन दास महाराज और गणेश दास महाराज के साथ बुद्धिजीवी बैकुंठनाथ महापात्र, मीनकेतन मोहंती और प्रदीप कुमार बेहरा तथा स्थानीय लोगों ने प्रतिभागियों का स्वागत किया।
वरिष्ठ पत्रकार प्रभात पाणिग्राही ने मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और धार्मिक महत्ता पर प्रकाश डालते हुए इसके विकास से जुड़ी परंपरागत मान्यताओं की जानकारी दी। कमल लोचन दास महाराज ने मंदिर में प्रतिदिन संपन्न होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों, पारंपरिक पूजा-पद्धतियों और वार्षिक धार्मिक उत्सवों के बारे में बताया। बैकुंठनाथ महापात्र और मीनकेतन मोहंती ने भी मंदिर की सांस्कृतिक विरासत तथा ऐतिहासिक महत्व से संबंधित अपने विचार साझा किए।
स्थानीय मान्यताओं में गजपति दिव्यसिंह देव से जुड़ा मंदिर का इतिहास
मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक परंपराओं में गजपति दिव्यसिंह देव द्वितीय के साथ इसके संभावित संबंध का भी उल्लेख मिलता है। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, ब्रिटिश शासन के दौरान गजपति को अंडमान द्वीप समूह में निर्वासित किए जाने की सजा सुनाई गई थी, लेकिन वे वहां से भाग निकले। बाद में उन्हें पकड़ लिया गया और कटक जेल में बंद कर दिया गया।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने बाबा रघुबीर दास के यहां शरण ली। ऐसी भी मान्यता है कि बाद में वे दयानिधि दास के नाम से प्रसिद्ध हुए। हालांकि, ये विवरण मंदिर से जुड़ी स्थानीय ऐतिहासिक परंपराओं का हिस्सा हैं और इनकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
मंदिर के आराध्य देवताओं की स्थापना को लेकर भी एक प्रचलित लोककथा है। मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में दर्शन देकर बेरुहान गांव से पवित्र काष्ठ लाने का निर्देश दिया था, ताकि उससे देवप्रतिमाओं का निर्माण किया जा सके। कहा जाता है कि पुरी से आए कारीगरों ने इन प्रतिमाओं का निर्माण किया था। इसके बाद केरल से आए माने जाने वाले श्रोत्रिय ब्राह्मणों ने देवताओं की प्राण-प्रतिष्ठा की थी।
स्थानीय परंपराओं के अनुसार, प्रारंभ में देवताओं की पूजा एक साधारण फूस की झोपड़ी में की जाती थी। बाद में वहां एक बड़े मंदिर का निर्माण हुआ। मंदिर के विकास और उसकी बढ़ती धार्मिक प्रतिष्ठा के साथ जगुलीपटना भी एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।
हेरिटेज वॉक के दौरान प्रतिभागियों ने मंदिर की विशिष्ट धार्मिक पहचान पर भी चर्चा की। यहां भगवान जगन्नाथ को पुरुषोत्तम स्वरूप में, उनके बड़े भाई अनंत को भगवान बलभद्र के रूप में तथा उनकी बहन सुभद्रा को आराध्य देवी के रूप में पूजा जाता है।
विशिष्ट देवप्रतिमाएं मंदिर को देती हैं अलग धार्मिक पहचान
श्री अनंत पुरुषोत्तम मंदिर की प्रमुख विशेषताओं में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पूर्ण आकार की देवप्रतिमाएं शामिल हैं। इन प्रतिमाओं की विशिष्ट बनावट और उनसे जुड़ी पूजा-पद्धतियां मंदिर को एक अलग धार्मिक पहचान प्रदान करती हैं।
भगवान बलभद्र के हाथों में हल और मूसल दर्शाए गए हैं, जबकि भगवान जगन्नाथ के हाथों में शंख और चक्र हैं। देवप्रतिमाओं की ये विशेषताएं तथा मंदिर में प्रचलित पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान इसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
मंदिर परिसर में श्री भैरवेश्वर, श्री चैतन्य, हनुमान और देवी लक्ष्मी के मंदिर भी स्थित हैं। इसके अतिरिक्त, यहां महंत रघुबीर दास की समाधि भी है।
हेरिटेज वॉक के दौरान प्रतिभागियों ने कल्पवट वृक्ष, श्री भैरव मंदिर, पूर्व महंतों की समाधियों, करुण्य कुंड, जगुलेई मंदिर और गुंडिचा मंडप का भी भ्रमण किया। ये सभी स्थल मंदिर परिसर की धार्मिक परंपराओं, संस्थागत इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को प्रतिबिंबित करते हैं।
इस भ्रमण के माध्यम से प्रतिभागियों को मुख्य मंदिर के अलावा परिसर में मौजूद अन्य ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को भी समझने का अवसर मिला। इन स्थलों ने कई पीढ़ियों से स्थानीय लोगों के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन को प्रभावित किया है। ऐसे में इनके संरक्षण को भी समान महत्व दिए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
लंबे अंतराल के बाद १९८० में फिर शुरू हुई रथयात्रा
कार्यक्रम के दौरान मंदिर की वार्षिक रथयात्रा भी चर्चा का महत्वपूर्ण विषय रही। प्रतिभागियों द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, परंपरागत रूप से यहां तीन रथों के साथ रथयात्रा का आयोजन किया जाता था। हालांकि, एक अवधि के दौरान यह परंपरा स्थगित रही।
वर्ष १९८० में रथयात्रा को फिर से शुरू किया गया। इसके बाद से यह उत्सव मंदिर की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल रहा है। रथयात्रा के आयोजन से मंदिर का भगवान जगन्नाथ की उपासना तथा क्षेत्र की पारंपरिक उत्सव संस्कृति से जुड़ाव निरंतर बना हुआ है।
प्रतिभागियों ने इन परंपराओं का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करने और इनके महत्व को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि पारंपरिक धार्मिक उत्सवों की निरंतरता ऐतिहासिक धार्मिक संस्थानों की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पूर्व महंतों की जर्जर समाधियों ने बढ़ाई संरक्षण की चिंता
हेरिटेज वॉक के दौरान पूर्व महंतों की समाधियों की खराब होती स्थिति प्रमुख चिंता के रूप में सामने आई। प्रतिभागियों ने इन संरचनाओं के उचित रखरखाव के अभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि ये समाधियां मंदिर के संस्थागत इतिहास और धार्मिक परंपराओं की महत्वपूर्ण धरोहर हैं।
उन्होंने समाधियों की स्थिति का व्यवस्थित सर्वेक्षण कराने, नियमित रखरखाव सुनिश्चित करने तथा उनके आगे क्षरण को रोकने के लिए आवश्यक संरक्षण उपाय अपनाने की मांग की।
प्रतिभागियों ने इस बात पर भी जोर दिया कि ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण का दायरा केवल प्रसिद्ध मंदिरों और बड़े स्मारकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। स्थानीय धार्मिक संस्थानों के इतिहास को संजोने वाली समाधियों, पारंपरिक संरचनाओं और अन्य ऐतिहासिक स्थलों को भी संरक्षण की प्राथमिकता में शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि इन संरचनाओं की उपेक्षा जारी रही, तो क्षेत्र के अतीत से जुड़े महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य धीरे-धीरे नष्ट हो सकते हैं। संबंधित अधिकारियों और अन्य हितधारकों से इन धरोहरों की ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए इनके संरक्षण के लिए उचित कदम उठाने का आग्रह किया गया।
यह मुद्दा विरासत संरक्षण से जुड़ी एक व्यापक चुनौती को भी सामने लाता है। जहां प्रमुख धार्मिक स्थलों और ऐतिहासिक स्मारकों को अक्सर पर्याप्त सार्वजनिक ध्यान मिलता है, वहीं उनसे जुड़ी छोटी समाधियां और अन्य ऐतिहासिक संरचनाएं उपेक्षित रह जाती हैं, जबकि वे स्थानीय धार्मिक संस्थानों के इतिहास और सांस्कृतिक विकास की महत्वपूर्ण कड़ियां होती हैं।
स्थानीय इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर
तीसरे खोरधा हेरिटेज वॉक का उद्देश्य जिले के कम चर्चित ऐतिहासिक स्थलों और सांस्कृतिक धरोहरों को व्यापक जनसमुदाय के सामने लाना तथा उनके संरक्षण में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाना था।
आयोजकों ने जिले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संपदा के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने तथा इनके संरक्षण के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को स्थानीय इतिहास, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक जड़ों से परिचित कराना आवश्यक है, ताकि क्षेत्र की समृद्ध विरासत को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके।
कार्यक्रम का समन्वय प्रीतिपल्लवी महापात्र ने किया। आयोजन को सफल बनाने में आयोजन समिति के अन्य सदस्यों ने भी सहयोग दिया।
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