सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में वंदे मातरम् के १५० वर्ष पूरे होने पर विशेष कार्यक्रम ;


‘नमामि मातरम्’ कार्यक्रम में राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक महत्व और देशभक्ति की भावना पर प्रकाश

दिलीप कुमार पटनायक

खोरधा, २५ सितंबर: खोरधा स्थित सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में वंदे मातरम् के १५० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। विद्या भारती की पहल ‘नमामि मातरम्’ के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक महत्व तथा देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना के संचार में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया।
कार्यक्रम में विद्यालय के षष्ठ से दशम वर्ग तक के ५०० से अधिक विद्यार्थियों के साथ शिक्षक-शिक्षिकाओं, प्रधानाचार्य, उपप्रधानाचार्य तथा विद्यालय प्रबंधन समिति के सदस्यों ने भाग लिया। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने सामूहिक रूप से वंदे मातरम् का गायन कर इस कालजयी रचना के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। वंदे मातरम् ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनमानस में राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।


कार्यक्रम में स्वागत भाषण देते हुए विद्यालय के उपप्रधानाचार्य प्रभाकर स्वाईं ने कहा कि वंदे मातरम् के १५०वें वर्ष को स्मरणीय बनाने के उद्देश्य से विद्या भारती ने देशभर के अपने सरस्वती शिशु विद्या मंदिरों में ‘नमामि मातरम्’ कार्यक्रम आयोजित करने की पहल की है।
उन्होंने कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनचेतना जागृत करने तथा देशवासियों में राष्ट्रभक्ति की भावना को प्रबल बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। यह गीत भारत की राष्ट्रीय पहचान, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रभावना का प्रतीक बनकर प्रत्येक भारतीय के हृदय में विशेष स्थान रखता है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-प्रांतीय सेवा प्रमुख बेलश्वर साहू ने वंदे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व तथा स्वतंत्रता आंदोलन में इसके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि किस प्रकार इस गीत ने देश की स्वतंत्रता के लिए लोगों को एकजुट होने और सामूहिक रूप से संघर्ष करने की प्रेरणा दी।
विश्व हिंदू परिषद के जिला सह-सचिव प्रभात पाणिग्राही ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने संबोधन में स्वदेशी आंदोलन तथा बंगाल विभाजन के विरोध में हुए आंदोलनों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् उस दौर में जनजागरण और जनसमूहों को एकजुट करने की सशक्त आवाज बनकर उभरा था।
उन्होंने विद्यार्थियों में देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और ऐतिहासिक चेतना विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। वंदे मातरम् को केवल एक गीत या नारा मानने के बजाय उन्होंने इसे भारत की राष्ट्रीय चेतना, मातृभूमि के प्रति प्रेम तथा राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रतीक बताया।
वक्ताओं ने स्मरण कराया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदे मातरम् के उद्घोष ने कई पीढ़ियों के भारतीयों में साहस, त्याग और स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रबल आकांक्षा का संचार किया था। अंग्रेजी शासन के दौर में यह गीत उन स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना, जिन्होंने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया और अपना जीवन तथा निजी हित तक न्योछावर कर दिए।
कार्यक्रम के दौरान इस बात पर भी बल दिया गया कि वंदे मातरम् से जुड़े आदर्शों को केवल औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। वक्ताओं ने विद्यार्थियों से राष्ट्रीय एकता बनाए रखने, देश की सांस्कृतिक विरासत और मूल्यों की रक्षा करने तथा जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम का समापन वंदे मातरम् की चिरस्थायी प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए हुआ। वक्ताओं ने कहा कि यह राष्ट्रगीत आज भी देशभक्ति, राष्ट्रीय पहचान और भारत के गौरवशाली स्वतंत्रता संग्राम के प्रति सम्मान की भावना को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

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